Monday, 3 September 2012

जनता के धन की होली....

हमारे देश की यह कैसी स्थिति है कि छह दशक बाद भी हमारे नेता लोकलुभावन आश्वासनों के आधार पर चुनाव जीत रहे हैं। जीतने के बाद वादे पूरे करे या न करे, इसकी चिन्ता भी न पार्टी को रहती है, न ही मतदाता को। इससे बड़ी हास्यास्पद बात किसी लोकतंत्र में क्या हो सकती है? ऊपर से हमारे शहंशाह, मुख्य चुनाव आयुक्त, जो कुर्सी संभालते ही भाषण देना शुरू कर देते हैं, जैसा कि आजकल प्रेस परिषद के अध्यक्ष कर रहे हैं और बिना किसी सार्थक परिणाम के निवृत्त हो जाते हैं। फिर किसको डर लगेगा, इन अधिकारियों का।

हाल ही गुजरात में कांग्रेस ने घोषणा की कि यदि वह सत्ता में आई तो सबको आवास देगी। भाजपा क्यों पीछे रहती! उसने तो आवास बनवाकर योजना लागू भी कर दी है। इसी तरह छत्तीसगढ़ सरकार जो चना पांच रूपए किलो दे रही थी, अब पांच रूपए का दो किलो देने लग गई है। चुनाव में अभी समय बाकी है। फिर भी क्यों होने लगी घोषणाएं मतदाता को लुभाने की अभी से? हमारे चुनाव नियमों की अस्पष्टता के कारण अथवा अधिकारियों का जिम्मेदारी से पलायन कर जाना इसका कारण है।

अभी यूपी में, तमिलनाडु में, पंजाब और उत्तराखण्ड में विधानसभाओं के चुनाव हुए। समाजवादी पार्टी ने हाईस्कूल पास करने पर टेबलेट, इण्टर पास को लैपटॉप देने का वादा किया था। बेरोजगारों को तीन हजार रू. मासिक भत्ता देने की घोषणा की थी। किसानों को ऋण माफी की घोषणा। हर मुस्लिम बालिका को तीस हजार रूपए देने का वादा। हारी हुई पार्टियों की बात अभी नहीं करते।

तमिलनाडु में जयललिता ने सभी राशन कार्ड धारियों को टेबल पंखा तथा मिक्सर ग्राइण्डर देने की बात की थी। मुफ्त दुधारू पशु वितरण योजना, बी.पी.एल. परिवारों को 35 किलो चावल मुफ्त आदि घोषणाएं की थी। इन सभी दलों की घोषणाओं की शिकायत इसलिए वैध नहीं मानी गई, क्योंकि ये तो मात्र घोषणाएं थीं। वास्तविक खर्च नहीं था।
आज जब इनकी सरकारें बन गई और इन घोषणाओं को मूर्त रूप दिया जा रहा है, तब चुनाव आयुक्त कार्यालय मौन क्यों है? क्या हजारों करोड़ के खर्च चुनाव खर्च का अंग नहीं माने जाने चाहिए? क्या जनता के इस धन का चुनाव आयोग को लेखा नहीं मांगना चाहिए? आज तक तो ऎसा कभी नहीं हुआ। इससे बड़ा भ्रष्टाचार चुनाव संहिता के नाम पर क्या हो सकता है।
जनता की आंखों में सरकार की स्वीकृति के साथ धूल झोंकी जा रही है। न्यायालय में तो कोई जाकर रोने वाला चाहिए। वरना कौन दुश्मनी मोल ले! तब हर चुनाव में, हर दल जनता के धन की होली क्यों नहीं खेले? ऎसी घोषणाओं के बाद तो किसी प्रत्याशी को अघिक धन खर्च करने की भी जरूरत नहीं रह जाती। कोई भी अपराधी जेल में बैठकर इन घोषणाओं के सहारे चुनाव जीत सकता है। थोड़ा सा लेन-देन बढ़ा दे तो फरार घोषित लोग भी चुनाव जीत सकते हैं। कब पैदा होगा कृष्ण जो लोकतंत्र की लाज रखेगा।

jtuh’k Mkjk---

Saturday, 14 April 2012

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Sunday, 25 March 2012

प्रेम

यूँ तो ना गयी वहाँ, कोई खबर.. पर आहों के खामोश असर
पैगाम हुए ......बदनाम हुए ..
यूँ तो ना दिए , कुछ सुख हमको .. पर उनसे जो पहुचें दुख हमको
इनाम हुए ..बदनाम हुए
जब होने लगे ये हाल अपने .. शब रोशन साफ़ खयाल अपने
इबहाम हुए .....बदनाम हुए                                   
  इतने गहराई लिए शब्द सेतु ... क्या पढ़ कर अनायास ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है  कि इसे रचने के  लिए किस कदर का प्रेम महसूस किया होगा नायिका ने
"प्रेम " जिसे कबीर ने ढाई अक्षर मे खोजने को कहा ,  और  जाने कितनी हजारो कालजयी कृतिया प्रेम पर उतार दी गयी , मगर लगता है शब्द रचना से इसे पूर्ण  समेटा ना जा सकेगा कभी ।  मगर कृष्ण ने इस पर पूरी कृष्ण लीला ही रच दी ,
प्रेम को छु लेने का साहस जो कृष्ण ने किया वो युगो युगो तक कोई पुरुष ना कर पाया 
कृष्ण को इसीलिए सम्पूर्ण युग पुरुष की संज्ञा से नवाजा गया है । नीति विशेषज्ञ कृष्ण ने प्रेम मे कोई नीति निर्धारित ना की मगर क्या वे राधा की विरह को उतनी गहराई से समझ पाये , कुछ का मानना है नहीं , वे इसे समझते तो राधा को इस तरह विरह के जंगल मे झुलसने ना देते । मगर कुछ इस प्रेम को  देह के परे मान कर  राधा की विरह बेला को भी कृष्ण लीला मे समाहित कर गए । 

मगर क्या किसी ने सोचा है  आज भी हजारो ,लाखो नारिया  अपने जीवन काल मे राधा स्वरूप को जी रही है  , चाहे वो पत्नी रूप मे है या प्रेमिका ... प्रेम तो दोनों करती है अपने नायक से ... तभी तो  जहा  रिश्ते मे  प्रेम है वहा आज भी कृष्ण और राधा स्वरूप आमने सामने  आते है , तब  आज भी हर  स्त्री पुरुष बंधन अपनी एक अलग कहानी रचता है ,अत  जहा प्रेम है वहा वेदना है जहा वेदना है वहा पहले दुख , फिर तकलीफ और फिर विरह घर बनाते जाते है ,  इसीलिए जहा हर नारी  को उदासी के उस अथाह समुंदर मे गोते लगाते देखा जा सकता है , वही पुरुष उसके  अंत करण मे जाने कितने  यहा वहा बिखरे  खारे पानी के मोतियो  को  समेट कर माला गूँथने मे असफल रहा है   ।प्राचीन काल से आज तक मे  चाहे जीतने युग बदले हो मगर प्रेम का यह स्वरूप नहीं बदला...क्योकि आज भी प्रेम की कृष्ण बिना अधूरी है ... अब जहा प्रेम है वहा या तो मिलन  होगा या विरह .. कृष्ण ने अपने पूरे जीवन काल में अपनी  अपनी लीला दिखाई परंतु फिर क्यो राधा को अकेला छोड़ कर मथुरा चले गए ... वजह मिलन से भी उच्च होता है विरह ।
विरह मे ही प्रेम की उच्च कोटी की भावना छिपी होती है यहा  प्रेमीसिर्फ प्रेम करता है अपने प्रेम के बदले उसे कुछ नहीं चाहिए ।
अब इसी प्रेम की तुलना आज के प्रेम से कीजिये - पति - पत्नी मे प्रेम है मगर यहा भी कुछ स्वार्थपरता जुड़ी है जब तक एक स्वार्थ है प्रेम खींचता चला जाता है जब लक्ष्य अलग होते है तो अलगाव शुरू हो जाता है    इसे हम विरह तो ना कहेंगे । मगर फिर भी क्यो प्रेम का अस्तित्व आज भी मौजूद है धरती पर ... प्रश्न यू ही रहेगा उत्तर आप खोजिए ।  
..........रजनीश

मनुष्य प्राणी है पृथ्वी लोक का।

मनुष्य
प्राणी है
पृथ्वी लोक का।
हर हाल में
जुडे रहना है
धरती से।
जब छूट जाती है
धरती,
जीने लगता है
देव लोक में,
इंद्रियों के सहारे,
बुद्धि के सहारे
प्राणों के सहारे,
तब उखड जाते हैं
पांव
जमीन से।
जवाब देने लगता है
शरीर,
छूटने लगते हैं
सहारे
डरने लगता है
पांव रखने से
जमीन पर।
पार्थिव देह
हिलने लगती है
बिना सहारे
बिगड जाता है
लौकिक व्यवहार
सृष्टि-रचना से।