Saturday, 16 July 2011
असंवैधानिक!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
आजादी के साठ साल बाद लोकतांत्रिक सरकार में किसी केन्द्र सरकार और राज्य सरकार स्तर की कार्यवाही, गतिविधि या किसी योजना को सर्वोच्च न्यायालय की ओर से असंवैधानिक ठहराना इस बात का प्रमाण है कि दोनों ही सरकारों का काम-काज लोकतंत्र के स्वरूप पर ही गहरी चोट करने जैसा चल रहा है। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के विरूद्ध चलाया गया अभियान मानवीय संवेदनाओं की सभी सीमाओं को पार चुका था। आदिवासियों को बन्दूक की नोक पर पहाड़ों से नीचे उतार कर जंगल और पहाड़ खाली करवाए जा रहे थे।
आज भी बन्दूक की नोक पर उनसे जमीनें बेचने की कार्रवाई करते रहते हैं। दक्षिण छत्तीसगढ़ के बस्तर की तरह उत्तर के अकेले जाजंगीर जिले में 35 से ज्यादा पावर प्लान्ट बनाने के करार किए जा चुके हैं और इनके लिए सार्वजनिक उपयोग के नाम पर अपरिवर्तनीय भूमि को रूपान्तरित करके उद्योगपतियों को हस्तान्तरित किया जा रहा है। जो रूकावट पैदा करेगा, उसके साथ नक्सलियों जैसा व्यवहार होगा। इसके लिए आदिवासियों को ही हथियार उपलब्ध करा दिए सरकार ने, ताकि मारे भी वही और मरे भी वही।
सर्वोच्च न्यायालय का इतने साहसपूर्ण फैसले के लिए अभिनन्दन, साधुवाद, नमन और वन्दन! आश्चर्य की बात तो यह है कि इस असंवैधानिक गतिविधि को बनाए रखने के लिए केन्द्र सरकार की हजारों करोड़ रूपए की राशि राज्य सरकार के पेट में जा रही थी। इस दौरान हुई हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए, जैसे जंगलों से पेड़ काटे जाते हैं। इनमें नक्सली भी थे और बेगुनाह भी।
इसी धन से कुछ भिण्डरेवाला भी पैदा हो गए। जैसे प. बंगाल के पुरूलिया में केन्द्र सरकार ने नक्सलियों को राज्य के विरूद्ध हथियार उपलब्ध कराए थे। हाल में, पिछले माह जयराम रमेश ने कुछ नए क्षेत्र भी छत्तीसगढ़ में खनन के लिए संरक्षित वन भूमि से खोल दिए। सर्वोच्च न्यायालय ने लोकतंत्र की हिलती हुई जड़ों की ओर देश को चेतावनी दी है, किन्तु यह नहीं बताया कि होना क्या चाहिए। न तो केन्द्र सरकार अपने मंत्री एवं विभाग के विरूद्ध अभियोग चलाने वाली और न ही राज्य सरकार अपने किए-कराए को गलत मानने वाली।
अब या तो स्वयं सर्वोच्च न्यायालय आगे बढ़े या फिर राष्ट्रपति को विधि विशेषज्ञों से राय करके कुछ कठोर कदम उठाने चाहिए। इतने बड़े लोकतंत्र में असंवैधानिक सरकारी गतिविधि स्वयं लोकतंत्र का भी और 125 करोड़ नागरिकों का अपमान है। उल्लेखनीय है कि माओवादी नक्सलवाद के नाम से विनायक सेन को राजद्रोह के अपराध में राज्य सरकार ने जेल में बन्द कर दिया था। उच्च न्यायालय से उसको जमानत भी नहीं मिली। उच्चतम न्यायालय ने यह कहते हुए जमानत स्वीकार कर ली कि वहां ऎसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।
अब जब उच्चतम न्यायालय ने सरकार प्रायोजित सलवा जुडूम को ही असंवैधानिक घोषित कर दिया, तब क्या स्वयं राज्य सरकार पर सवालिया निशान नहीं लग जाते? अब तक हजारों करोड़ रूपए का उपयोग इसी सरकार ने ही इस असंवैधानिक गतिविधि में किया है। नक्सल समस्या के केन्द्र में जाने की तैयारी (जड़ तक पहुंचने की) न राज्य सरकार ने दिखाई है, न ही केन्द्र सरकार ने जबकि मूल रूप से उत्तरदायित्व केन्द्र सरकार का ही है, जिसके निर्देशन में राज्य सरकारें काम करती हैं।
एक नक्सल क्षेत्र केन्द्रीय रूप में दण्डकारण्य (सभी छ: राज्यों की सीमा पर) के एक लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में कार्यरत है, जो संयुक्त रूप से इन प्रदेशों में सरकारों के समानान्तर कार्य करता है। इनकी आय का स्त्रोत स्थानीय लकड़ी, वन्य जीव आदि हैं।
उनके मार्ग बन्द करके सरकारें उनसे निपट सकती हैं। चन्दन तस्कर वीरप्पन की तरह। कुछ स्थानीय विद्रोही सरकारों की नीतियों से पैदा होते हैं। इनको स्वीकारने की तैयारी राज्य सरकारों की कम होती है। इस तंत्र की अपनी अर्थव्यवस्था होती है, जिसमें बड़े-बड़े औद्योगिक घराने भी जुड़े हैं। स्थानीय नागरिकों को तो हर स्थिति में अत्याचार ही सहने पड़ते हैं। राजनेता भी इनको विकसित करना नहीं चाहते। इनको आप रोटी, कपड़ा, इलाज, शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधाएं तो दें। नक्सलियों के नाम सारा धन ऊपर वाले खा जाएंगे, तो क्या ये लोग प्रतिक्रिया नहीं करेंगे? इसका उत्तर भी उच्चतम न्यायालय से ही अपेक्षित है।
आज भी बन्दूक की नोक पर उनसे जमीनें बेचने की कार्रवाई करते रहते हैं। दक्षिण छत्तीसगढ़ के बस्तर की तरह उत्तर के अकेले जाजंगीर जिले में 35 से ज्यादा पावर प्लान्ट बनाने के करार किए जा चुके हैं और इनके लिए सार्वजनिक उपयोग के नाम पर अपरिवर्तनीय भूमि को रूपान्तरित करके उद्योगपतियों को हस्तान्तरित किया जा रहा है। जो रूकावट पैदा करेगा, उसके साथ नक्सलियों जैसा व्यवहार होगा। इसके लिए आदिवासियों को ही हथियार उपलब्ध करा दिए सरकार ने, ताकि मारे भी वही और मरे भी वही।
सर्वोच्च न्यायालय का इतने साहसपूर्ण फैसले के लिए अभिनन्दन, साधुवाद, नमन और वन्दन! आश्चर्य की बात तो यह है कि इस असंवैधानिक गतिविधि को बनाए रखने के लिए केन्द्र सरकार की हजारों करोड़ रूपए की राशि राज्य सरकार के पेट में जा रही थी। इस दौरान हुई हिंसा में सैकड़ों लोग मारे गए, जैसे जंगलों से पेड़ काटे जाते हैं। इनमें नक्सली भी थे और बेगुनाह भी।
इसी धन से कुछ भिण्डरेवाला भी पैदा हो गए। जैसे प. बंगाल के पुरूलिया में केन्द्र सरकार ने नक्सलियों को राज्य के विरूद्ध हथियार उपलब्ध कराए थे। हाल में, पिछले माह जयराम रमेश ने कुछ नए क्षेत्र भी छत्तीसगढ़ में खनन के लिए संरक्षित वन भूमि से खोल दिए। सर्वोच्च न्यायालय ने लोकतंत्र की हिलती हुई जड़ों की ओर देश को चेतावनी दी है, किन्तु यह नहीं बताया कि होना क्या चाहिए। न तो केन्द्र सरकार अपने मंत्री एवं विभाग के विरूद्ध अभियोग चलाने वाली और न ही राज्य सरकार अपने किए-कराए को गलत मानने वाली।
अब या तो स्वयं सर्वोच्च न्यायालय आगे बढ़े या फिर राष्ट्रपति को विधि विशेषज्ञों से राय करके कुछ कठोर कदम उठाने चाहिए। इतने बड़े लोकतंत्र में असंवैधानिक सरकारी गतिविधि स्वयं लोकतंत्र का भी और 125 करोड़ नागरिकों का अपमान है। उल्लेखनीय है कि माओवादी नक्सलवाद के नाम से विनायक सेन को राजद्रोह के अपराध में राज्य सरकार ने जेल में बन्द कर दिया था। उच्च न्यायालय से उसको जमानत भी नहीं मिली। उच्चतम न्यायालय ने यह कहते हुए जमानत स्वीकार कर ली कि वहां ऎसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।
अब जब उच्चतम न्यायालय ने सरकार प्रायोजित सलवा जुडूम को ही असंवैधानिक घोषित कर दिया, तब क्या स्वयं राज्य सरकार पर सवालिया निशान नहीं लग जाते? अब तक हजारों करोड़ रूपए का उपयोग इसी सरकार ने ही इस असंवैधानिक गतिविधि में किया है। नक्सल समस्या के केन्द्र में जाने की तैयारी (जड़ तक पहुंचने की) न राज्य सरकार ने दिखाई है, न ही केन्द्र सरकार ने जबकि मूल रूप से उत्तरदायित्व केन्द्र सरकार का ही है, जिसके निर्देशन में राज्य सरकारें काम करती हैं।
एक नक्सल क्षेत्र केन्द्रीय रूप में दण्डकारण्य (सभी छ: राज्यों की सीमा पर) के एक लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में कार्यरत है, जो संयुक्त रूप से इन प्रदेशों में सरकारों के समानान्तर कार्य करता है। इनकी आय का स्त्रोत स्थानीय लकड़ी, वन्य जीव आदि हैं।
उनके मार्ग बन्द करके सरकारें उनसे निपट सकती हैं। चन्दन तस्कर वीरप्पन की तरह। कुछ स्थानीय विद्रोही सरकारों की नीतियों से पैदा होते हैं। इनको स्वीकारने की तैयारी राज्य सरकारों की कम होती है। इस तंत्र की अपनी अर्थव्यवस्था होती है, जिसमें बड़े-बड़े औद्योगिक घराने भी जुड़े हैं। स्थानीय नागरिकों को तो हर स्थिति में अत्याचार ही सहने पड़ते हैं। राजनेता भी इनको विकसित करना नहीं चाहते। इनको आप रोटी, कपड़ा, इलाज, शिक्षा जैसी आधारभूत सुविधाएं तो दें। नक्सलियों के नाम सारा धन ऊपर वाले खा जाएंगे, तो क्या ये लोग प्रतिक्रिया नहीं करेंगे? इसका उत्तर भी उच्चतम न्यायालय से ही अपेक्षित है।
Tuesday, 5 July 2011
हिन्दी व्याकरण - भाषा, व्याकरण और बोली
परिभाषा- भाषा अभिव्यक्ति का एक ऐसा समर्थ साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को दूसरों पर प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार जाना सकता है।
संसार में अनेक भाषाएँ हैं। जैसे-हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी, बँगला,गुजराती,पंजाबी,उर्दू, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, फ्रैंच, चीनी, जर्मन इत्यादि।
भाषा के प्रकार- भाषा दो प्रकार की होती है-
1. मौखिक भाषा।
2. लिखित भाषा।
आमने-सामने बैठे व्यक्ति परस्पर बातचीत करते हैं अथवा कोई व्यक्ति भाषण आदि द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तो उसे भाषा का मौखिक रूप कहते हैं।
जब व्यक्ति किसी दूर बैठे व्यक्ति को पत्र द्वारा अथवा पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं में लेख द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तब उसे भाषा का लिखित रूप कहते हैं।
संसार में अनेक भाषाएँ हैं। जैसे-हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी, बँगला,गुजराती,पंजाबी,उर्दू, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, फ्रैंच, चीनी, जर्मन इत्यादि।
भाषा के प्रकार- भाषा दो प्रकार की होती है-
1. मौखिक भाषा।
2. लिखित भाषा।
आमने-सामने बैठे व्यक्ति परस्पर बातचीत करते हैं अथवा कोई व्यक्ति भाषण आदि द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तो उसे भाषा का मौखिक रूप कहते हैं।
जब व्यक्ति किसी दूर बैठे व्यक्ति को पत्र द्वारा अथवा पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं में लेख द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तब उसे भाषा का लिखित रूप कहते हैं।
व्याकरण
मनुष्य मौखिक एवं लिखित भाषा में अपने विचार प्रकट कर सकता है और करता रहा है किन्तु इससे भाषा का कोई निश्चित एवं शुद्ध स्वरूप स्थिर नहीं हो सकता। भाषा के शुद्ध और स्थायी रूप को निश्चित करने के लिए नियमबद्ध योजना की आवश्यकता होती है और उस नियमबद्ध योजना को हम व्याकरण कहते हैं।
परिभाषा- व्याकरण वह शास्त्र है जिसके द्वारा किसी भी भाषा के शब्दों और वाक्यों के शुद्ध स्वरूपों एवं शुद्ध प्रयोगों का विशद ज्ञान कराया जाता है।
भाषा और व्याकरण का संबंध- कोई भी मनुष्य शुद्ध भाषा का पूर्ण ज्ञान व्याकरण के बिना प्राप्त नहीं कर सकता। अतः भाषा और व्याकरण का घनिष्ठ संबंध हैं वह भाषा में उच्चारण, शब्द-प्रयोग, वाक्य-गठन तथा अर्थों के प्रयोग के रूप को निश्चित करता है।
व्याकरण के विभाग- व्याकरण के चार अंग निर्धारित किये गये हैं-
1. वर्ण-विचार।
2. शब्द-विचार।
3. पद-विचार।
4. वाक्य विचार।
परिभाषा- व्याकरण वह शास्त्र है जिसके द्वारा किसी भी भाषा के शब्दों और वाक्यों के शुद्ध स्वरूपों एवं शुद्ध प्रयोगों का विशद ज्ञान कराया जाता है।
भाषा और व्याकरण का संबंध- कोई भी मनुष्य शुद्ध भाषा का पूर्ण ज्ञान व्याकरण के बिना प्राप्त नहीं कर सकता। अतः भाषा और व्याकरण का घनिष्ठ संबंध हैं वह भाषा में उच्चारण, शब्द-प्रयोग, वाक्य-गठन तथा अर्थों के प्रयोग के रूप को निश्चित करता है।
व्याकरण के विभाग- व्याकरण के चार अंग निर्धारित किये गये हैं-
1. वर्ण-विचार।
2. शब्द-विचार।
3. पद-विचार।
4. वाक्य विचार।
बोली
भाषा का क्षेत्रीय रूप बोली कहलाता है। अर्थात् देश के विभिन्न भागों में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है और किसी भी क्षेत्रीय बोली का लिखित रूप में स्थिर साहित्य वहाँ की भाषा कहलाता है।
लिपि
किसी भी भाषा के लिखने की विधि को ‘लिपि’ कहते हैं। हिन्दी और संस्कृत भाषा की लिपि का नाम देवनागरी है। अंग्रेजी भाषा की लिपि ‘रोमन’, उर्दू भाषा की लिपि फारसी, और पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी है।
साहित्य
Sunday, 3 July 2011
बन जाओ भगत सिंह
देश में एक तूफान उठा है काले धन का। धन भी काला। लक्ष्मी काली। बड़े-बड़े नेताओं के नाम कई देशों में जमा है चोरी का यह धन। लाखों करोड़ रूपए हैं। अन्ना हजारे-बाबा रामदेव से लेकर आम आदमी तक जुड़ गया इस अभियान में। वे लोग भी जुड़े नजर आने लगे, जिनका धन भी जमा है विदेशी बैंकों में। लगता है सरकार पर दबाव बढ़ता ही जा रहा है। सरकार की मजबूरी यह है कि यदि नामों का खुलासा हो जाए तो कांग्रेस में कौन बचे। जिनके नामों की शपथ ले-लेकर कांग्रेस सांसें गिन रही है, उनके नाम भी सूची में आते दिखाई पड़ रहे हैं। पार्टी सत्ता में है। तुरन्त सत्ता चली जाएगी।
सरकार ने एक नाटक चला रखा है। इस मुद्दे को बनाए भी रखो और आगे भी मत बढ़ने दो। स्विस सरकार को कोई एतराज नहीं है जानकारी देने में। हमारी सरकार लेने को तैयार नहीं है। दिखाने के लिए चिट्ठी-पत्री तो करती है, किन्तु गलत एवं अनावश्यक जानकारियां भेजकर पत्रावलियां चलाती रहती है। निश्चित है कि स्विस सरकार से फिर सही जानकारियां देने के पत्र आते रहते हैं। जैसे बोफोर्स सौदे की फाइल के साथ हुआ था। अन्त में उस फाइल को बन्द ही कर दिया गया। किसी तरह की जानकारी संसद के पटल पर नहीं रखी गई।
अब परिस्थिति और भी नाजुक है। सैकड़ों नाम सामने आने का भय है। तब क्या करे सरकार? दूसरे गैर-राजनीतिक लोगों की फाइलें दूसरे देशों से मंगाओ। उनके नाम उजागर करो और काले धन पर कार्रवाई करते रहो। ताकि जनता को यह भी लगे कि सरकार काले धन के खिलाफ कार्रवाई भी कर रही है। और नेता भी बचे रहें। किसी तरह पांच साल पूरे हो सकें।
अभी हाल ही में दिल्ली में जिस दलाल पंकज कपूर को पकड़ा, यह भी ध्यान बंटाने वाली कार्रवाई है। दलाल ने तुरन्त स्वीकार भी कर लिया कि उसने अब तक एक हजार करोड़ रूपए हवाला के जरिए देश के बाहर भेजे हैं। जांच एजेंसियों को ऎसी पकड़ के लिए बधाई मिलनी ही चाहिए। अब देखना यह है कि जो सूची सामने आएगी, उसमें किन-किन के नाम पढ़ने को मिलेंगे। क्या इनमें कोई एक राजनेता भी होगा या यूरोप के लिंचटेस्टाइन शहर के एल जी टी बैंक से प्राप्त सूची की तरह सभी आम व्यवसायी होंगे।
सरकार को एक बड़ा अवसर इस बात से मिला हुआ है कि विपक्ष कमजोर है। हालांकि विपक्ष में अधिक नेताओं का धन बाहर नहीं होगा, किन्तु जो कर्णधार हैं, उनका धन बाहर है। जब इन नेताओं को सूची के कुछ नाम दिखाए जाते हैं,तो ये अपना नाम देखकर चुपचाप चल देते हैं। बाकी नामों को देखने की जिज्ञासा भी नहीं रहती। तब इन्हीं के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान कैसे सफल हो पाएगा। भाजपा और संघ से जुड़े अनेक बड़े नेता तो भ्रष्टाचार के लिए देश में ही बदनाम हैं। कहीं सरकार ने जोखिम उठाकर छोटी सूची जारी कर दी और उसमें विपक्ष के बड़े नेताओं के दो-चार नाम भी डाल दिए तो क्या होगा? एक तरफ आडवाणी जी ने अपना वादा नहीं निभाया कि भाजपा यह शपथ-पत्र देगी कि उसके नेताओं का कोई काला धन विदेशों में नहीं है। भूल गए हैं शायद लिखकर देना या दबाव में आ गए। आज की परिस्थिति में एक ही मार्ग है देश के सामने।
भाजपा आगे आए कि सूची शीघ्र मंगाई जाए। हमारे नाम हैं तो भी परवाह नहीं। माफी मांग लेंगे जनता से। किन्तु साठ बरस की सच्चाई देखकर जनता अगले सौ साल तो भूल नहीं दोहराएगी। दो बार
कौन मरता है। अच्छा तो यह है कि देश के नाम पर बन जाओ भगत सिंह।
सरकार ने एक नाटक चला रखा है। इस मुद्दे को बनाए भी रखो और आगे भी मत बढ़ने दो। स्विस सरकार को कोई एतराज नहीं है जानकारी देने में। हमारी सरकार लेने को तैयार नहीं है। दिखाने के लिए चिट्ठी-पत्री तो करती है, किन्तु गलत एवं अनावश्यक जानकारियां भेजकर पत्रावलियां चलाती रहती है। निश्चित है कि स्विस सरकार से फिर सही जानकारियां देने के पत्र आते रहते हैं। जैसे बोफोर्स सौदे की फाइल के साथ हुआ था। अन्त में उस फाइल को बन्द ही कर दिया गया। किसी तरह की जानकारी संसद के पटल पर नहीं रखी गई।
अब परिस्थिति और भी नाजुक है। सैकड़ों नाम सामने आने का भय है। तब क्या करे सरकार? दूसरे गैर-राजनीतिक लोगों की फाइलें दूसरे देशों से मंगाओ। उनके नाम उजागर करो और काले धन पर कार्रवाई करते रहो। ताकि जनता को यह भी लगे कि सरकार काले धन के खिलाफ कार्रवाई भी कर रही है। और नेता भी बचे रहें। किसी तरह पांच साल पूरे हो सकें।
अभी हाल ही में दिल्ली में जिस दलाल पंकज कपूर को पकड़ा, यह भी ध्यान बंटाने वाली कार्रवाई है। दलाल ने तुरन्त स्वीकार भी कर लिया कि उसने अब तक एक हजार करोड़ रूपए हवाला के जरिए देश के बाहर भेजे हैं। जांच एजेंसियों को ऎसी पकड़ के लिए बधाई मिलनी ही चाहिए। अब देखना यह है कि जो सूची सामने आएगी, उसमें किन-किन के नाम पढ़ने को मिलेंगे। क्या इनमें कोई एक राजनेता भी होगा या यूरोप के लिंचटेस्टाइन शहर के एल जी टी बैंक से प्राप्त सूची की तरह सभी आम व्यवसायी होंगे।
सरकार को एक बड़ा अवसर इस बात से मिला हुआ है कि विपक्ष कमजोर है। हालांकि विपक्ष में अधिक नेताओं का धन बाहर नहीं होगा, किन्तु जो कर्णधार हैं, उनका धन बाहर है। जब इन नेताओं को सूची के कुछ नाम दिखाए जाते हैं,तो ये अपना नाम देखकर चुपचाप चल देते हैं। बाकी नामों को देखने की जिज्ञासा भी नहीं रहती। तब इन्हीं के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान कैसे सफल हो पाएगा। भाजपा और संघ से जुड़े अनेक बड़े नेता तो भ्रष्टाचार के लिए देश में ही बदनाम हैं। कहीं सरकार ने जोखिम उठाकर छोटी सूची जारी कर दी और उसमें विपक्ष के बड़े नेताओं के दो-चार नाम भी डाल दिए तो क्या होगा? एक तरफ आडवाणी जी ने अपना वादा नहीं निभाया कि भाजपा यह शपथ-पत्र देगी कि उसके नेताओं का कोई काला धन विदेशों में नहीं है। भूल गए हैं शायद लिखकर देना या दबाव में आ गए। आज की परिस्थिति में एक ही मार्ग है देश के सामने।
भाजपा आगे आए कि सूची शीघ्र मंगाई जाए। हमारे नाम हैं तो भी परवाह नहीं। माफी मांग लेंगे जनता से। किन्तु साठ बरस की सच्चाई देखकर जनता अगले सौ साल तो भूल नहीं दोहराएगी। दो बार
कौन मरता है। अच्छा तो यह है कि देश के नाम पर बन जाओ भगत सिंह।
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