Sunday, 3 July 2011

बन जाओ भगत सिंह

देश में एक तूफान उठा है काले धन का। धन भी काला। लक्ष्मी काली। बड़े-बड़े नेताओं के नाम कई देशों में जमा है चोरी का यह धन। लाखों करोड़ रूपए हैं। अन्ना हजारे-बाबा रामदेव से लेकर आम आदमी तक जुड़ गया इस अभियान में। वे लोग भी जुड़े नजर आने लगे, जिनका धन भी जमा है विदेशी बैंकों में। लगता है सरकार पर दबाव बढ़ता ही जा रहा है। सरकार की मजबूरी यह है कि यदि नामों का खुलासा हो जाए तो कांग्रेस में कौन बचे। जिनके नामों की शपथ ले-लेकर कांग्रेस सांसें गिन रही है, उनके नाम भी सूची में आते दिखाई पड़ रहे हैं। पार्टी सत्ता में है। तुरन्त सत्ता चली जाएगी।
सरकार ने एक नाटक चला रखा है। इस मुद्दे को बनाए भी रखो और आगे भी मत बढ़ने दो। स्विस सरकार को कोई एतराज नहीं है जानकारी देने में। हमारी सरकार लेने को तैयार नहीं है। दिखाने के लिए चिट्ठी-पत्री तो करती है, किन्तु गलत एवं अनावश्यक जानकारियां भेजकर पत्रावलियां चलाती रहती है। निश्चित है कि स्विस सरकार से फिर सही जानकारियां देने के पत्र आते रहते हैं। जैसे बोफोर्स सौदे की फाइल के साथ हुआ था। अन्त में उस फाइल को बन्द ही कर दिया गया। किसी तरह की जानकारी संसद के पटल पर नहीं रखी गई।
अब परिस्थिति और भी नाजुक है। सैकड़ों नाम सामने आने का भय है। तब क्या करे सरकार? दूसरे गैर-राजनीतिक लोगों की फाइलें दूसरे देशों से मंगाओ। उनके नाम उजागर करो और काले धन पर कार्रवाई करते रहो। ताकि जनता को यह भी लगे कि सरकार काले धन के खिलाफ कार्रवाई भी कर रही है। और नेता भी बचे रहें। किसी तरह पांच साल पूरे हो सकें।
अभी हाल ही में दिल्ली में जिस दलाल पंकज कपूर को पकड़ा, यह भी ध्यान बंटाने वाली कार्रवाई है। दलाल ने तुरन्त स्वीकार भी कर लिया कि उसने अब तक एक हजार करोड़ रूपए हवाला के जरिए देश के बाहर भेजे हैं। जांच एजेंसियों को ऎसी पकड़ के लिए बधाई मिलनी ही चाहिए। अब देखना यह है कि जो सूची सामने आएगी, उसमें किन-किन के नाम पढ़ने को मिलेंगे। क्या इनमें कोई एक राजनेता भी होगा या यूरोप के लिंचटेस्टाइन शहर के एल जी टी बैंक से प्राप्त सूची की तरह सभी आम व्यवसायी होंगे।
सरकार को एक बड़ा अवसर इस बात से मिला हुआ है कि विपक्ष कमजोर है। हालांकि विपक्ष में अधिक नेताओं का धन बाहर नहीं होगा, किन्तु जो कर्णधार हैं, उनका धन बाहर है। जब इन नेताओं को सूची के कुछ नाम दिखाए जाते हैं,तो ये अपना नाम देखकर चुपचाप चल देते हैं। बाकी नामों को देखने की जिज्ञासा भी नहीं रहती। तब इन्हीं के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान कैसे सफल हो पाएगा। भाजपा और संघ से जुड़े अनेक बड़े नेता तो भ्रष्टाचार के लिए देश में ही बदनाम हैं। कहीं सरकार ने जोखिम उठाकर छोटी सूची जारी कर दी और उसमें विपक्ष के बड़े नेताओं के दो-चार नाम भी डाल दिए तो क्या होगा? एक तरफ आडवाणी जी ने अपना वादा नहीं निभाया कि भाजपा यह शपथ-पत्र देगी कि उसके नेताओं का कोई काला धन विदेशों में नहीं है। भूल गए हैं शायद लिखकर देना या दबाव में आ गए। आज की परिस्थिति में एक ही मार्ग है देश के सामने।
भाजपा आगे आए कि सूची शीघ्र मंगाई जाए। हमारे नाम हैं तो भी परवाह नहीं। माफी मांग लेंगे जनता से। किन्तु साठ बरस की सच्चाई देखकर जनता अगले सौ साल तो भूल नहीं दोहराएगी। दो बार
कौन मरता है। अच्छा तो यह है कि देश के नाम पर बन जाओ भगत सिंह।

No comments:

Post a Comment