माननीय प्रधानमंत्री जी,
देश को स्वतंत्र हुए 67 वर्ष हो गए किन्तु अभी तक हम अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए। क्योंकि हम लक्ष्य से ही भटक गए। हमने अंग्रेजों से मुक्ति पाई और अंग्रेजी संस्कृति के आज तक गुलाम हैं। हमारा शिक्षित वर्ग तो मुक्त होना भी नहीं चाहता। कार्यपालिका और न्यायपालिका का प्रशिक्षण एवं कार्य आज भी उसी शैली में हो रहा है। यही हाल सेना के ढांचे का भी है।
संविधान का भारतीयकरण भी आज तक नहीं हो पाया। संशोधन इतने कर दिए कि भारतीय नागरिक तो समझ ही नहीं सकता। देश में तो अभी समान नागरिकता भी स्वीकृत नहीं है। इसका बड़ा कारण है कि हमारा संविधान तो धर्मनिरपेक्ष (अधर्मी) बनकर रह गया है। संविधान में प्रकाशित राष्ट्रीय विरासत से जुड़े चित्रों को भी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हटा दिया गया। धर्म प्रत्येक व्यक्ति की निजी धरोहर है। इसका सामूहिक स्वरूप सम्प्रदाय कहलाता है। आपसे आशा भी करते हैं और अनुरोध भी, कि संविधान को धर्मनिरपेक्ष के स्थान पर “सम्प्रदाय निरपेक्ष” का रूप दिलवा दें। आज हमारी मूल्य परक शिक्षा की यह सबसे बड़ी बाधा है। सरकारी निर्णयों में भी धर्म प्रवेश कर सकेगा। देश इसके लिए सदा आपका ऋणी रहेगा।
यह देश आपसे एक अन्य अपेक्षा यह भी रखता है कि आप देश को एक राष्ट्रीय सरकार दें। आजादी के बाद एक बार भी संघीय ढांचा प्रभावी नहीं हुआ। न केन्द्र में और न ही राज्यों में। इससे बड़ी शर्म की बात इस देश के लिए हो ही क्या सकती है? आज भी आप किसी से पूछें, चाहे जनता से, चाहे सत्ता पक्ष से; सरकार किसकी है तब देखना सबका एक ही उत्तर होगा- “केन्द्र में भाजपा की, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात में भाजपा की, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की।” यही देश की दुर्दशा का एकमात्र कारण रहा है।
केन्द्रीय सरकार हो अथवा राज्य सरकार, संविधान में इसका एक ढांचा है। इसमें सत्ता पक्ष, विपक्ष, निर्दलीय, मनोनीत सांसद आदि सभी शामिल रहते हैं। सभी मिलकर सरकार हैं। आप भाजपा के प्रधानमंत्री नहीं हो सकते। न आपका मंत्रिमंडल भाजपा का हो सकता है। आपकी सरकार राष्ट्रीय सरकार है। सभी दलों की (राष्ट्रीय दलों की भी और क्षेत्रीय दलों की भी) सरकार है। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सबकी सरकार है। सरकार के फैसले सब पर एक समान लागू होने हैं। हिन्दू या मुसलमानों के नाम से अलग फैसले नहीं हो सकते।
चुनाव लड़ने तक जन प्रतिनिधि अपने दल का प्रतिनिधित्व करता है। उसी दल के नाम से जीतता या हारता है। किन्तु जीतने के बाद जब वह सदन के सदस्य के रूप में शपथ ले लेता है, तब वह सदन के अनुशासन में दीक्षित हो जाता है। सदन किसी एक दल का नहीं होता। वहां सम्पूर्ण राष्ट्र अथवा राज्य के परिप्रेक्ष्य में चर्चा होती है। वहां किसी दल के रूप में चर्चा करना, आलोचना करना, तर्क या विरोध करना संविधान और मतदाता दोनों का अपमान है। प्रशिक्षण के दौरान प्रत्येक नव-निर्वाचित सदस्य को इस सिद्धान्त से अवगत कराया जाना चाहिए।
अभी तक जितने भी फैसले पार्टी को ध्यान में रखकर किए गए- दिल्ली में भी और प्रान्तों में भी, सरकारों की लोकप्रियता कम करने वाले ही प्रमाणित हुए हैं। हम स्वीकार करें या न करें, यह अलग बात है। लोकसभा चुनाव में भाजपा की इतनी बड़ी जीत के थोड़े दिनों बाद ही उत्तराखण्ड के निकाय चुनावों एवं विधानसभा के तीनों उप चुनावों में कांग्रेस की जीत ने देश के समक्ष कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
कश्मीर में धारा 370 पर आप क्या निर्णय करते हैं, अयोध्या तथा बांग्लादेशियों के बारे में आप क्या निर्णय लेते हैं, ये विष्ाय समसामयिक माने जाएंगे। किन्तु संविधान का सम्प्रदाय निरपेक्ष होना, देश में राष्ट्रीय सरकार के सिद्धान्त की प्रतिष्ठा तथा समान नागरिक संहिता इस देश की एकता अैर अखण्डता में चार चांद लगा देंगे और तब हम देश को “इंडिया देट इज भारत” के स्थान पर भारत कह सकेंगे
देश को स्वतंत्र हुए 67 वर्ष हो गए किन्तु अभी तक हम अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए। क्योंकि हम लक्ष्य से ही भटक गए। हमने अंग्रेजों से मुक्ति पाई और अंग्रेजी संस्कृति के आज तक गुलाम हैं। हमारा शिक्षित वर्ग तो मुक्त होना भी नहीं चाहता। कार्यपालिका और न्यायपालिका का प्रशिक्षण एवं कार्य आज भी उसी शैली में हो रहा है। यही हाल सेना के ढांचे का भी है।
संविधान का भारतीयकरण भी आज तक नहीं हो पाया। संशोधन इतने कर दिए कि भारतीय नागरिक तो समझ ही नहीं सकता। देश में तो अभी समान नागरिकता भी स्वीकृत नहीं है। इसका बड़ा कारण है कि हमारा संविधान तो धर्मनिरपेक्ष (अधर्मी) बनकर रह गया है। संविधान में प्रकाशित राष्ट्रीय विरासत से जुड़े चित्रों को भी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हटा दिया गया। धर्म प्रत्येक व्यक्ति की निजी धरोहर है। इसका सामूहिक स्वरूप सम्प्रदाय कहलाता है। आपसे आशा भी करते हैं और अनुरोध भी, कि संविधान को धर्मनिरपेक्ष के स्थान पर “सम्प्रदाय निरपेक्ष” का रूप दिलवा दें। आज हमारी मूल्य परक शिक्षा की यह सबसे बड़ी बाधा है। सरकारी निर्णयों में भी धर्म प्रवेश कर सकेगा। देश इसके लिए सदा आपका ऋणी रहेगा।
यह देश आपसे एक अन्य अपेक्षा यह भी रखता है कि आप देश को एक राष्ट्रीय सरकार दें। आजादी के बाद एक बार भी संघीय ढांचा प्रभावी नहीं हुआ। न केन्द्र में और न ही राज्यों में। इससे बड़ी शर्म की बात इस देश के लिए हो ही क्या सकती है? आज भी आप किसी से पूछें, चाहे जनता से, चाहे सत्ता पक्ष से; सरकार किसकी है तब देखना सबका एक ही उत्तर होगा- “केन्द्र में भाजपा की, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात में भाजपा की, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की।” यही देश की दुर्दशा का एकमात्र कारण रहा है।
केन्द्रीय सरकार हो अथवा राज्य सरकार, संविधान में इसका एक ढांचा है। इसमें सत्ता पक्ष, विपक्ष, निर्दलीय, मनोनीत सांसद आदि सभी शामिल रहते हैं। सभी मिलकर सरकार हैं। आप भाजपा के प्रधानमंत्री नहीं हो सकते। न आपका मंत्रिमंडल भाजपा का हो सकता है। आपकी सरकार राष्ट्रीय सरकार है। सभी दलों की (राष्ट्रीय दलों की भी और क्षेत्रीय दलों की भी) सरकार है। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सबकी सरकार है। सरकार के फैसले सब पर एक समान लागू होने हैं। हिन्दू या मुसलमानों के नाम से अलग फैसले नहीं हो सकते।
चुनाव लड़ने तक जन प्रतिनिधि अपने दल का प्रतिनिधित्व करता है। उसी दल के नाम से जीतता या हारता है। किन्तु जीतने के बाद जब वह सदन के सदस्य के रूप में शपथ ले लेता है, तब वह सदन के अनुशासन में दीक्षित हो जाता है। सदन किसी एक दल का नहीं होता। वहां सम्पूर्ण राष्ट्र अथवा राज्य के परिप्रेक्ष्य में चर्चा होती है। वहां किसी दल के रूप में चर्चा करना, आलोचना करना, तर्क या विरोध करना संविधान और मतदाता दोनों का अपमान है। प्रशिक्षण के दौरान प्रत्येक नव-निर्वाचित सदस्य को इस सिद्धान्त से अवगत कराया जाना चाहिए।
अभी तक जितने भी फैसले पार्टी को ध्यान में रखकर किए गए- दिल्ली में भी और प्रान्तों में भी, सरकारों की लोकप्रियता कम करने वाले ही प्रमाणित हुए हैं। हम स्वीकार करें या न करें, यह अलग बात है। लोकसभा चुनाव में भाजपा की इतनी बड़ी जीत के थोड़े दिनों बाद ही उत्तराखण्ड के निकाय चुनावों एवं विधानसभा के तीनों उप चुनावों में कांग्रेस की जीत ने देश के समक्ष कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
कश्मीर में धारा 370 पर आप क्या निर्णय करते हैं, अयोध्या तथा बांग्लादेशियों के बारे में आप क्या निर्णय लेते हैं, ये विष्ाय समसामयिक माने जाएंगे। किन्तु संविधान का सम्प्रदाय निरपेक्ष होना, देश में राष्ट्रीय सरकार के सिद्धान्त की प्रतिष्ठा तथा समान नागरिक संहिता इस देश की एकता अैर अखण्डता में चार चांद लगा देंगे और तब हम देश को “इंडिया देट इज भारत” के स्थान पर भारत कह सकेंगे